Wednesday, December 13, 2017

लड़कियों! डर कर नहीं, डट कर ! - डाॅ. शरद सिंह ... चर्चा प्लस

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस, दैनिक सागर दिनकर,13.12.2017
लड़कियों! डर कर नहीं, डट कर !
- डाॅ. शरद सिंह
हम भारतीय अपनी संस्कृति पर गर्व करते हैं क्यों कि हमारी संस्कृति में स्त्री को पूजा के योग्य माना गया है। तो फिर यह कौन-सी संस्कृति जी रहे हैं हम आजकल, जिसमें दुधमुंही बच्चियों से ले कर नब्बे साल की स्त्री और नितान्त सामान्य परिवार की लड़की से ले कर सेलीब्रिटी लड़की तक यौन-अपराध का शिकार बन रही है? कोई हाथ नहीं उठते शिकार बनती लड़की की रक्षा के लिए, कोई भृकुटी नहीं तनती अपराध होते देख कर। हाल ही में ‘दंगल गर्ल’ के साथ हुए हादसे ने कई प्रश्न खड़े कर दिए हैं जिनके उत्तर स्वयं लड़कियों को ही ढूंढने होंगे यदि वे सुरक्षित जीना चाहती हैं तो।   
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar Daily newspaper
 
‘दंगल गर्ल’ के नाम से प्रसिद्ध युवा अभिनेत्री जायरा वसीम के साथ हुई घटना ने सिद्ध कर दिया है कि किसी भी तबके की लड़की आज सुरक्षित नहीं है। स्वयं जायरा वसीम के शब्दों में -‘‘‘मैं फ्लाइट में दिल्ली से मुंबई जा रही थी। और मेरे ठीक पीछे एक अधेड़ शख्स था। उसने मेरे ढाई घंटे के सफर को भयानक बना दिया। इसे बेहतर तरीके से समझने के लिए मैं फोन पर रिकॉर्ड करना चाहती थी, लेकिन रोशनी कम थी और मैं ऐसा नहीं कर पाई। मैंने पहले सोचा कि यह ट्रबुलेंस की वजह से है। पर बाद में यकीन हो गया कि वह जानबूझकर पीठ पर पैर फिरा रहा है। रोशनी कम हो गई थी इसलिए बात बिगड़ गई। यह अगले 5-10 मिनट तक चलता रहा। वह मेरे कंधे पर पैर रगड़ता रहा। मेरी पीठ और गर्दन पर पैर फिराता रहा। यह नहीं होना चाहिए था। मैं बहुत परेशान हूं... विस्तारा एयरलाइंस के बेहतरीन क्रू सदस्यों के लिए तालियां। क्या इस तरीके से आप लड़कियों का ख्याल रखेंगे? किसी के साथ ऐसा व्यवहार नहीं होना चाहिए। यह बहुत खौफनाक है। अगर हम खुद अपनी मदद करने का फैसला नहीं करते हैं तो कोई भी हमारी मदद नहीं करेगा। और यह सबसे खराब बात है।’’
नेशनल अवॉर्ड विजेता अभिनेत्री जायरा वसीम के साथ हुए इस हादसे ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। बेशक उन सवालों के उत्तर स्वयं लड़कियों को ही ढूंढने होंगे लेकिन इन सवालों पर गौर करना होगा सभी को। उन सवालों पर गौर करें इससे पहले दो ऐसे हादसे जिन्होंने पहला प्रश्न तो यही खड़ा कर दिया है कि हमारे सांस्कृतिक मूल्य कहां सो गए? 
जायरा वसीम तो सिर्फ़ छेड़छाड़ की शिकार हुईं लेकिन दो बच्चियों के साथ तो नृशंसता की सारी सीमाएं तोड़ दी गईं। गुरुवार, 7 अक्टूबर 2017 की वह काली रात का साए से कभी मन मुक्त हो भी सकेगा या नहीं, कहना कठिन है। उस हृदय विदारक घटना ने हर व्यक्ति को न केवल भीतर से हिला दिया बल्कि निर्भया कांड की याद ताज़ा करा दिया। मध्यप्रदेश के बीना जंक्शन से 30 किमी दूर भानगढ़ थाना क्षेत्र के एक गांव में गुरुवार रात दो युवकों ने घर में अकेली सो रही 14 साल की लड़की से गैंगरेप किया और केरोसिन डालकर आग लगा दी। लगभग 80 फीसदी जल चुकी लड़की को सागर के बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया घटना गुरुवार रात 9 बजे की थी। पीड़ित लड़की अपने घर में अकेली सो रही थी। इसी दौरान आरोपी शुभम पिता रामेश्वर यादव अपने दोस्त रब्बू पिता रामप्रसाद सेन 25 वर्ष के साथ घर में घुस गया। दोनों आरोपियों ने नाबालिग के साथ दुष्कर्म किया। पीड़ित ने इसका विरोध कर घटना की शिकायत करने बात की। कार्रवाई के डर से दोनों आरोपियों ने लड़की के ऊपर केरोसिन डालकर आग लगा दी। ग्रामीणों ने बताया कि आग की लपटों से घिरी लड़की घर के बाहर भागी और पड़ोसी के घर के सामने गिर गई। पड़ोसी ने पानी डालकर आग बुझाई और पुलिस को घटना की जानकारी दी। डायल 100 मौके पर पहुंची और आग से झुलसी लड़की को बीना के सिविल अस्पताल लाया गया।
यह घटना अभी ताज़ा ही थी कि शनिवार, 9 दिसम्बर 2017 को हिसार की जघन्य घटना ने एक और चोट की। हिसार में एक ऐसा मामला सामने आया, जो महिला सुरक्षा के दावों पर बड़ा-सा प्रश्नचिन्ह लगा दिया। हिसार के उकलाना गांव में एक पांच साल की बच्ची के साथ बलात्कार कर उसकी निर्ममता से हत्या कर दी गई। नृशंसता यह कि शनिवार को हुई इस घटना में बच्ची के साथ रेप के बाद उसके प्राइवेट पार्ट में आरोपी ने लकड़ी घुसा दी, जोकि बच्ची की मौत की वजह बनी। संचार माध्यमों के अनुसार, बच्ची अपनी मां और बहन के साथ सोई हुई थी। शनिवार सुबह उसका शव घर से करीब 250 मीटर दूर गली में नग्न हालत में खून से लथपथ मिला। डॉक्टरों के अनुसार, बच्ची के प्राइवेट पार्ट में दो फीट की लकड़ी डालने की वजह से गहरे जख्म हो गए थे। बच्ची के कंधे, माथे और पीठ पर खरोंचे पाई गईं. वहीं, जमीन पर पटके जाने की वजह से उसके नाक से खून भी बह रहा था। बच्ची के परिजनों के अनुसार, उनका परिवार यहां करीब 10-12 साल यहां रह रहा है। वे मेहनत-मजदूरी कर अपना गुजारा चलाते हैं। परिजनों के अनुसार, शुक्रवार रात करीब साढ़े नौ बजे बच्ची मां और बड़ी बहन के साथ झुग्गी में सोने गई थी। बच्ची की मां ने उन्होंने कोई आहट या शोर नहीं सुना। सुबह जब चाय के लिए बच्ची  को आवाज लगाई गई तो वह नहीं आई और गायब मिली। इसके बाद उसकी तलाश शुरू की गई। तब उन्हीं पता चला कि पास की गली में बच्ची खून से लथपथ पड़ी है।
कोई एक नन्हीं बच्ची के प्रति इतना क्रूर कैसे हो सकता है? दुर्भाग्य से यह क्रूरता सचमुच घटित हुई है। वैसे यदि गहराई से सोचा जाए तो हम चूक पर चूक किए जा रहे हैं लड़कियों की सुरक्षा को ले कर। जब ऐसी किसी घटना की गूंज राष्ट्रीय पटल तक पहुंचती है तो उस समय तक वह पूरे राजनीतिक मुद्दे में ढल चुकी होती है और फिर शुरू होता है बेतुके शर्मसार करने वाली टीका-टिप्पणियों का दौर। इस शोरशराबे में मूल मुद्दा बहुत पीछे छूट जाता है। भीड़ की ओर से भी वैसी आवाज़ नहीं उठती जैसी कि राजनीतिक टीका-टिप्पणियों या फिर सिनेमा के मुद्दों पर उठती है। कहीं ऐसा तो नहीं कि यह चुप्पी ही अपराधियों को बढ़ावा दे रही हो? अभिनेत्री जायरा वसीम के साथ की गई अपमानजनक हरकतों पर फोगाट बहनों ने सटीक टिप्पणी की। बबिता फोगाट ने जायरा को संदेश दिया कि -‘‘‘लड़कियां मजबूत बनें। ऐसी हरकत करने वालों को थप्पड़ जड़ें। दोबारा ऐसी हरकत नहीं करेगा। जायरा, रियल लाइफ में धाकड़ बनो।’’
वहीं गीता फोगाट ने कहा कि -‘‘‘जायरा के साथ जो हुआ, वह बहुत शर्मनाक है। अगर मैं उसकी जगह होती तो रोना उसे पड़ता, जिसने ऐसी हरकत की है।’’
दोनों बहनों ने जायरा ही नहीं अपितु देश की हर लड़की को यह संदेश दिया है जिसे अपनी सुरक्षा के परिप्रेक्ष्य में लड़कियों को गांठ बांध लेना चाहिए। जहां तक जायरा वसीम के साथ हुई घटना कर सवाल है तो यही कहना होगा कि अपने साथ होने वाली आपत्तिजनक हरकतों पर कभी मौन न रहें। मोबाईल पर वीडियो बनाने के बजाए, उसी समय ऊंची आवाज़ में जोर से डपट दें या फिर शोर मना कर सबका ध्यान उस हरकत की ओर खींचे। जायरा वसीम पता नहीं कैसे इतना सब सहन करती रहीं वरना जब सिटी बस, लोकल ट्रेन या आॅटो, टेम्पो आदि में कोई भी लफंगा किसी लड़की को गलत इरादे से छूने का प्रयास करता है तो ‘अरे, ये क्या कर रहे हो?’ ‘तुमसे सीधे नहीं बैठा जाता है क्या?’ या ‘सीधे खड़े नहीं रह सकते हो क्या?’ जैसी डांट लगा कर उसे डरने को मज़बूर कर देती है। क्यों कि जब वह ऊंची आवाज़ में डांटती है तो उसके पास मौजूद अन्य लोग उसका ही पक्ष लेते हैं। अमिताभ बच्चन अभिनीत ‘पिंक’ में भी यही संदेश दिया गया था कि शारीरिक क्षमता से कहीं अधिक बुलंद आवाज़ रक्षा करती है। फिल्म का वह दृश्य जब साथ चल रही तापसी को लफंगों द्वारा छेड़े जाने पर उम्रदराज़ दो-दो हाथ करने में अक्षम वकील के रूप में अभिताभ पूरी ताकत से चींखते हैं, जिसे सुन कर वे लफंगे समझ जाते हैं कि अब लोग इकट्ठा हो जाएंगे और उनकी अब खैर नहीं, लिहाज़ा वे भाग खड़े होते हैं।
यह साहस जायरा क्यों नहीं जुटा सकी? क्या यह मौन उस तमाम लड़कियों के मौन का प्रतीक है जो अपनी बहनों के साथ हो रहे जघन्य अपराधों के विरुद्ध डट कर विरोध प्रदर्शन करने के बजाए अपने चेहरे को कपड़े से ढांक कर स्वयं को सुरक्षित मानने का भ्रम पाले जा रही हैं। क्या सामूहिक बलात्कार के बाद ज़िंदा जला दी गई लड़की के प्रति देश की तमाम लड़कियों का इतना भी दायित्व नहीं बनता कि उसके शीघ्र स्वस्थ होने की दुआ के साथ एक मोमबत्ती जलाएं और साथ ही ऐसी घटनाओं का अहिंसात्मक किन्तु जोरदार विरोध करें। शासन कड़े कानून भले ही बना दे लेकिन उन कानूनों की ज़रूरत ही न पड़े और एक सुरक्षित वातावरण बना सके इसके लिए लड़कियों को स्वयं भी आगे आना होगा और  परस्पर एक-दूसरे का संबल बनना होगा। इसके साथ ही समाज को भी समझना होगा कि मात्र सांस्कृतिक मूल्यों की दुहाई देने से यह समस्या समाप्त नहीं होगी। इन्टरनेट के इस युग में अपराध पांव पसार चुके हैं, ऐसे अपराधों के लिए लड़कियों की आजादी छीनने से भी कुछ नहीं होगा, यदि कुछ होगा तो सजगता और एकजुटता से।     
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Wednesday, December 6, 2017

My Birthday Celebration By Dainik Bhaskar Sagar Raahgiri


On the celebrating my birthday along with talented children in the joint ceremony of Dainik Bhaskar Sagar Edition, Sagar Raahgiri Social Group and Shubha Environment  Samajotthan Samiti Sagar, I planted a tree, gave a message of environmental protection and cut cake. In the celebration memento and honor gave to me by Dainik Bhaskar Sagar Rahgiri Raahgiri and Kadam Sanstha Jabalpur. On this occasion, I and My Elder Sister Dr. Varsha Singh awarded the talented children on behalf of Dainik Bhaskar Sagar Raahgiri.
To give such a Love and respect, I am very grateful to Dainik Bhaskar Sagar Raahgiri, Shubha Environment Samajotthan Samiti, Sagar and Kadam Sansthan Jabalpur.
Photos of the same occasion  -




















डॉ. अम्बेडकर के जीवन को प्रभावित करने वाली स्त्रियां - डॉ. शरद सिंह... चर्चा प्लस

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस (दैनिक सागर दिनकर, 06.12.2017)

डॉ. अम्बेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस (6दिसम्बर) पर विशेष :

 
डॉ. अम्बेडकर के जीवन को प्रभावित करने वाली स्त्रियां
- डॉ. शरद सिंह
डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने 'हिन्दू कोड बिल’ के जरिए स्त्रियों को समान अधिकार और संरक्षण दिए जाने की पैरवी की। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि स्त्रियों को संपत्ति, विवाह-विच्छेद, उत्तराधिकार, गोद लेने का अधिकार दिया जाए। स्त्री का विवाह की उसकी मर्जी के बिना न किया जाए। स्त्रियों को पढ़ने का भरपूर अवसर दिया जाए। ऐसे स्त्री-अधिकारों के पक्षधर डॉ. अम्बेडकर के जीवन को भी कुछ स्त्रियों ने प्रभावित किया था। डॉ. अम्बेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस के अवसर पर यहां प्रस्तुत हैं मेरी पुस्तक ‘‘डॉ. अम्बेडकर का स्त्रीविमर्श’’ का एक अंश।

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 डॉ. भीराव अम्बेडकर ने अपने जीवन में स्त्रियों के हित की रक्षा करने के लिए अनेक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कदम उठाए। उनके इन कदमों के पीछे वे स्त्रियां मौजूद थीं जिन्होंने जाने-अनजाने डॉ. अम्बेडकर के जीवन को प्रभावित किया। उनमें जीवनदायिनी मां भीमाबाई, बुआ मीराबाई, सौतेली मां जिजाबाई, प्रथम पत्नी रमाबाई प्रमुख थीं।
जीवनदायिनी मां भीमाबाई - डॉ. अम्बेडकर की मां भीमाबाई वाक्चातुर्य की धनी, सुन्दर, सुशील और धर्मपरायण थीं। वे अत्यन्त स्वाभिमानी थीं। रामजी सकपाल अपने अल्प वेतन से पैसे बचाकर भीमाबाई के पास भेजते थे जो पूरे परिवार के लिये पर्याप्त नहीं था। परिवार के खर्चों को पूरा करने के लिये भीमाबाई ने सान्ताक्रूज में सड़क पर बजरी (कंकड़-पत्थर) बिछाने की मजदूरी का काम करना शुरू कर दिया। कुछ समय बाद भाग्य ने करवट ली और रामजी सकपाल की योग्यता को पहिचान कर उन्हें पूणे के पन्तोजी विद्यालय में पढ़ने का अवसर दिया गया परीक्षा पास करने के उपरान्त उन्हें फौजी छावनी के विद्यालय में अध्यापक का पदभार सौंपा गया। शीघ्र ही उन्हें प्रधान अध्यापक बना दिया गया। वे लगभग चौदह वर्ष तक प्रधान अध्यापक रहे। जिससे उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती गयी। इस बीच भीमाबाई ने तेरह संतानों को जन्म दिया जिनमें सात संताने ही जीवित रहीं, शेष का बचपन में ही निधन हो गया था।
भीमाबाई बहुत अधिक व्रत-उपवास करती थीं। साथ ही उनकी बीमारी का सही निदान न होने के कारण स्वास्थ्य लगातार गिरने लगा। रामजी सकपाल का स्थानांतरण अलग-अलग छावनियों में होता रहता था। महू (मध्यप्रदेश में इन्दौर के निकट) में रहते समय रामजी सकपाल और भीमाबाई ने कामना की कि उनका एक ऐसा पुत्र उत्पन्न हो जो दीन दुखियों की सेवा करे। भीमाबाई की यह प्रार्थना शीघ्र ही फलीभूत हुई और उन्होंने 14 अप्रैल 1891 को एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम भीमराव रखा गया। भीमराव को अपनी मां का स्नेह अधिक समय तक नहीं मिल पाया। अस्वस्थता के कारण भीमाबाई का निधन हो गया।
भीमराव अपनी मां को ‘बय’ कह कर पुकारते थे। उन्हें अपनी मां से अगाध स्नेह था। मां की मृत्यु के उपरान्त भी वे अपनी ‘बय’ को कभी भुला नहीं सके। स्वाभिमान, दृढ़ इच्छाशक्ति और किसी भी संकट का साहस के साथ सामना करने का गुण भीमराव को अपनी मां भीमाबाई से मानो अनुवांशिक रूप में मिला था। यह गुण भी उन्हें अपनी मां से ही मिला था कि कोई भी काम छोटा नहीं होता है। ये सारे गुण भीमराव को जीवन में सतत आगे बढ़ाते रहे।

बुआ मीराबाई - मीराबाई डॉ. अम्बेडकर की बुआ थीं। वे उत्साही होने के साथ परिवार-प्रबंधन में निपुण थीं। दुर्भाग्यवश उनका वैवाहिक जीवन सुखद नहीं था। पति से अनबन के कारण उन्हें मायके में अपने छोटे भाई रामजी सकपाल के साथ रहना पड़ रहा था। भीमराव की मां भीमाबाई का निधन होने के बाद मीराबाई ने भीमराव को मां की कमी नहीं होने दी। भीमराव के प्रति उनका अगाध स्नेह था। मीराबाई अत्यंत मितव्ययी थीं। किन्तु बालक भीमराव को यही लगता था कि बुआ के पास पर्याप्त पैसा है। इसीलिए जब भीमराव के मन में विचार आया कि कुली का काम कर के वे परिवार को इच्छित सहयोग नहीं कर सकते हैं और उन्हें मुंबई जा कर मिल में काम करना चाहिए, तो उन्हें मुंबई जाने के लिए धन की आवश्यकता का अनुभव हुआ। उन्हें लगा कि बुआ जिस बटुवे को हमेशा अपनी कमर में खोंसे रहती हैं, उसमें अवश्य इतना पैसा निकल आएगा कि वे उस पैसे से मुंबई पहुंच जाएंगे। वे बुआ से पैसे मांग कर अपने मुंबई जाने का इरादा प्रकट नहीं करना चाहते थे। अतः उन्होंने बुआ के बटुए से चुपचाप पैसे निकालने का निश्चय किया। रात को भीमराव और उनके बड़े भाई बुआ की दाईं-बाईं ओर सोते थे तथा यह क्रम बदलता रहता था। जिस रात भीमराव बटुवे की ओर सोए, उन्होंने चुपके से बटुवा खोल कर देखा। बटुवे में झांकते ही वे सन्न रह गए। बटुवे में मात्र दो पैसे थे। भीमराव का यह भ्रम टूट गया कि बुआ के पास पर्याप्त पैसे हैं। वे सोच में पड़ गए कि इतने कम पैसों में बुआ इतने सारे सदस्यों का लालन-पालन कैसे कर रही हैं? उन्हें अपने किए पर पश्चाताप हुआ और उन्होंने मुंबई जाने का निश्चय छोड़ कर पढ़ाई में मन लगाने का निश्चय किया। उन्हें लगा कि पढ़-लिख कर ही वे परिवार का सहारा बन सकते हैं। इस घटना के बाद भीमराव के व्यक्तित्व का कायाकल्प हो गया। पढ़ाई के प्रति उदासीन रहने वाला बालक पढ़ाई के प्रति समर्पित हो गया। जो शिक्षक पहले भीमराव के ठीक से न पढ़ने की शिकायत उनके पिता से करते रहते थे, वे अब भीमराव की बुद्धिमानी को देखते हुए उन्हें आगे पढ़ाने का आग्रह करने लगे। यह परिवर्तन बुआ मीराबाई के मितव्ययी स्वभाव और ममत्व के कारण हुआ।
सौतेली मां जिजाबाई - भीमाबाई की मृत्यु के बाद डॉ. अम्बेडकर के पिता रामजी सकपाल ने दूसरा विवाह जिजाबाई से किया। जिजाबाई विधवा थीं। जिजाबाई भी रामजी सकपाल के प्रति पूर्ण समर्पिता रहीं। किन्तु बालक भीमराव को उस समय अपनी सौतेली मां पर बहुत क्रोध आता था जब वे उनकी ‘बय’ अर्थात् मां भीमाबाई के कपड़े और जेवर पहन लेती थीं। एक बार त्यौहार के अवसर पर जिजाबाई ने भीमाबाई के कपड़े-जेवर पहन लिए। यह देख कर उन्हें अपनी सौतेली मां पर बहुत क्रोध आया। वे अपनी सौतेली मां जिजाबाई से झगड़ा करने लगे। उसी समय रामजी सकपाल घर आ गए। उन्होंने झगड़े का कारण पूछा तो बालक भीम ने कारण बता दिया। यह सुन कर पिता ने भीमराव को ही डांट दिया। इस पर भीमराव को लगा कि उन्हें स्वयं पैसे कमाने होंगे। इसीलिए उन्होंने ढोर चराए, खेत पर काम किया और तो और कुली का भी काम किया। यद्यपि इसके बाद उनके ज्ञानचक्षु खुल गए और वे समझ गए कि यदि वे परिवार की सहायता करना चाहते हैं तो उन्हें अध्ययन में मन लगाना होगा।
आयु के बढ़ने के साथ-साथ भीमराव अपनी सौतेली मां जिजाबाई के मनोविज्ञान को समझते गए और वे उनके चिड़चिड़े स्वभाव को अनदेखा कर उन्हें सदा मान-सम्मान देते रहे। यहां तक कि जिजाबाई की मृत्यु के शोक में डूबे होने के कारण उन्होंने नवम्बर 1997 में दलित वर्ग द्वारा आयोजित सम्मेलन में भाग नहीं लिया।
पत्नी रमाबाई - डॉ. अम्बेडकर जब मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की तभी उनके विवाह के लिए योग्य लड़की की खोज शुरू कर दी गई। उनके लिए रामीबाई को पसन्द किया गया। उस समय रामीबाई नौ साल की थीं और भीमराव सोलह साल के थे। विवाह के बाद रामीबाई का नाम बदल कर रमाबाई रखा गया। रमाबाई बचपन से ही शांत स्वभाव की थीं। वे मितव्ययी और सहनशील भी थीं। मैट्रिक उत्तीर्ण छात्र भीमराव को संविधान निर्माता बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर के स्वरूप तक पहुंचने में रमाबाई के समर्पित सहयोग को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। डॉ. अम्बेडकर उच्चअध्ययन के लिए अमेरिका गए उन दिनों रमाबाई गर्भवती थीं। शीघ्र ही उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम गंगाधर रखा गया। दुर्भाग्यवश गंगाधर बचपन में ही परलोक सिधार गया। उनके दूसरे पुत्र यशवंत का स्वास्थ्य प्रायः खराब रहता था जिसकी चिकित्सा के लिए वे जूझती रहती थीं किन्तु अपने पति डॉ. अम्बेडकर के अध्ययनकार्य को बाधित नहीं होने देती थीं। लंदन में अध्ययन के समय डॉ. अम्बेडकर को अपने मित्र से उधार मांग कर काम चलाना पड़ा। उस समय भी रमाबाई ने धन की कमी का उलाहना अपने पति को कभी नहीं दिया। उनका प्रयास यही रहता था कि पारिवारिक विषमताओं का प्रभाव डॉ. अम्बेडकर के जीवन पर न पड़ने पाए और वे निश्चिन्त भाव से अपने महान उद्देश्यों की पूर्ति में संलग्न रहें। रमाबाई के इस समर्पित भाव का डॉ. अम्बेडकर के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा और वे भारतीय समाज की प्रत्येक स्त्री की जीवनदशा एवं संघर्षों के बारे में गहराई से समझ सके।

सविता देवी - पत्नी रमाबाई की मृत्यु के उपरान्त डॉ. अम्बेडकर ने सामाज में जातिगत एकता का आदर्श स्थापित करते हुए ब्राह्मण परिवार की विधवा स्त्री सविता देवी से विवाह किया। सविता देवी सुशिक्षित थीं। पुत्र यशवंत राव के विवाह में डॉ. अम्बेडकर के सम्मिलित न हो पाने पर सविता देवी ने मां के रूप में विवाह में सहयोग दिया। वे डॉ. अम्बेडकर के अंतिम समय तक उनके साथ रहीं तथा उनके कार्यों में उन्हें सहयोग देती रहीं। विवाह से पहले उनकी पत्नी का नाम शारदा कबीर था। डॉ. अम्बेडकर के साथ ही उन्होंने ने भी बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया था।
डॉ. अम्बेडकर के जीवन से जुड़ी इन सभी स्त्रियों ने प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से उन पर अपना स्थाई प्रभाव डाला। इन स्त्रियों के जीवन और समाज में उनके स्थान तथा उनके कर्त्तव्यबोध के प्रति डॉ. अम्बेडकर सदा चिन्तनशील रहे तथा इससे उन्हें समाज में स्त्री की दशा को समझने का पर्याप्त अवसर मिला।
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उल्लेखनीय : बाबा साहब पर मेरी पुस्तक " डॉ अंबेडकर का स्त्रीविमर्श " सन् 2012 में प्रकाशित हुई थी।
पुस्तक के प्रकाशक- भारत बुक सेन्टर, 17, अशोक मार्ग, लखनऊ (उत्तर प्रदेश)- 226001

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रेप और गैंगरेप के विरुद्ध ऐतिहासिक क़दम - डॉ. शरद सिंह... चर्चा प्लस

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस (दैनिक सागर दिनकर, 29.11.2017)
रेप और गैंगरेप के विरुद्ध ऐतिहासिक क़दम
- डॉ.शरद सिंह

12 साल या उससे कम उम्र की बच्ची के साथ बलात्कार तथा किसी महिला के साथ गैंगरेप के अपराधी को फांसी की सज़ा दिए जाने के ऐतिहासिक फैसले ने मध्यप्रदेश को महिलाओं की सुरक्षा के प्रति सजग राज्य का पहला दर्जा दिला दिया है। यद्यपि इस प्रकार का कठोर दण्ड जहां एक ओर ऐसे जघन्य अपराध पर अंकुश लगाने का कार्य करेगा वहीं दूसरी ओर कानून और न्याय व्यवस्था से हर स्तर पर और अधिक सजगता, तत्परता और निष्पक्षता की मांग करेगा। तमाम साक्ष्यों के साथ यह सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक होगा कि अभियुक्त वास्तविक अपराधी है या नहीं। इसके लिए उन सभी लोगों को भी भावुकता का त्याग करना होगा जो अपराध की गंभीरता एवं अमानवीयता को देख कर अभियुक्त का मुद्दमा न लड़ने की घोषणा कर बैठते हैं। अपराधी माने जा रहे व्यक्ति का अपराध जब तक सिद्ध न हो जाए उसे कानून के प्रतिनिधियों के माध्यम से अपना पक्ष सामने रखने का अधिकार होता है। यह अधिकार उसे इसीलिए दिया जाता है कि कहीं कोई निरपराध सजा का भागी न बन जाए। फांसी जैसी सजा के मामले में यह दायित्व और अधिक गंभीर हो जाता है। फिर भी इसमें कोई संदेह नहीं कि यह बच्चियों एवं महिलाओं के प्रति किए जाने वाले अपराधों के विरुद्ध एक कठोर और मजबूत कदम सिद्ध होगा। वैसे, रेप एवं गैंगरेप के मामलों में जुवेनाईल धाराओं में भी अभी संशोधन की आवश्यकता है।
 
Column Charcha Plus, Dainik Sagar Dinkar, Dr (Miss) Sharad Singh

आज देश में बार-बार यह प्रश्न उठता है कि बलात्कार की घटनाओं पर कैसे अंकुश लगाया जाए? महिलाओं को यौन अपराध से कैसे सुरक्षित किया जाए? बलात्कारी को मृत्युदण्ड दिए जाने का प्रश्न भी एक ज्वलंत प्रश्न रहा है। इस प्रश्न पर सबसे बड़ी अड़चन यह आती रही है कहीं किसी निरपराधी को बलात्कारी का ठप्पा लगा कर सूली पर न चढ़ा दिया जाए। बहरहाल, मध्यप्रदेश विधानसभा का शीतकालीन सत्र शुरू होने से एक दिन पहले कैबिनेट ने 12 साल या उससे कम उम्र की लड़कियों से बलात्कार या किसी भी उम्र की महिला से गैंगरेप के दोषी को फांसी की सज़ा देने को मंजूरी दे दी। कैबिनेट में अपने फैसले के लिये 376 ए ए और 376 डी ए के रूप में संशोधन किया गया। यह भी कहा गया है कि लोक अभियोजन की सुनवाई का अवसर दिए बिना जमानत नहीं होगी. शादी का प्रलोभन देकर शारीरिक शोषण करने के आरोपी को सजा के लिए 493 क में संशोधन करके संज्ञेय अपराध बनाने का प्रस्ताव किया गया। महिलाओं के खिलाफ आदतन अपराधी को धारा 110 के तहत गैर जमानती अपराध और जुर्माने की सज़ा देने के साथ महिलाओं का पीछा करने का अपराध दूसरी बार साबित होने पर न्यूनतम एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। कैबिनेट की बैठक के बाद वित्त मंत्री जयंत मलैया ने कहा, “मंत्रिमंडल ने 12 साल या उससे कम उम्र की बच्ची के साथ बलात्कार के दोषी को मृत्युदंड की मंजूरी दे दी है, गैंगरेप के दोषियों को भी मृत्युदंड का प्रस्ताव पारित कर दिया गया है।’’
यद्यपि पिछले कैबिनेट की बैठक में मलैया और ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव ने आशंका जताई थी कि बलात्कारियों के लिए मौत की सजा पीड़ितों के लिए एक बड़ा खतरा होगा क्योंकि अपराधी उन्हें मारने की कोशिश करेंगे। इसलिए कैबिनेट की मुहर लगाने से पहले इस मामले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अधिक विचार-विमर्श और कानूनी सलाह के लिये कुछ और समय लिया। मुख्यमंत्री चौहान ने भोपाल में 19 साल की युवती के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद कहा था कि बलात्कार के दोषियों को फांसी की सज़ा देनी चाहिये और वो कानून बनाकर विधेयक को मंजूरी के लिए भारत सरकार को भेजेंगे।
महिलाओं के खिलाफ आदतन अपराधी को धारा 110 के तहत गैर जमानती अपराध और जुर्माने की सजा का प्रावधान किया गया है। महिलाओं का पीछा करने, छेड़छाड़, निर्वस्त्र करने, हमला करने और बलात्कार का आरोप साबित होने पर न्यूनतम जुर्माना एक लाख रुपए लगाया जाएगा। हाल ही में राजधानी भोपाल में हुई गैंग रेप की घटना के बाद मध्य प्रदेश सरकार पर कानून व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े हुए थे। यही नहीं, पीड़िता ने भी कहा था कि आरोपियों को चौराहे पर फांसी दी जाए।
सरकार ने बलात्कार मामले में सख्त फैसला लेते हुए आरोपियों के जमानत की राशि बढ़ाकर एक लाख रुपये कर दी है। इस तरह मध्य प्रदेश देश का पहला राज्य बन गया है, जहां बलात्कार के मामले में इस तरह के कानून के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है। साथ ही शादी का प्रलोभन देकर शारीरिक शोषण करने के आरोपी को सजा के लिए 493 क में संशोधन करके संज्ञेय अपराध बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है।
निश्चित रूप से यह एक ऐतिहासिक और साहसिक फैसला है। आशा की जा सकती है कि इससे महिलाओं के विरुद्ध यौन अपराध करने वालों में भय व्याप्त होगा तथा बलात्कार तथा अन्य प्रकार के यौनअपराधों में भी कमी आएगी। किन्तु इस फैसले का एक पक्ष और है जो अपनेआप में संवेदनशील है। यह पक्ष है कि कहीं किसी निर्दोष को दण्ड का भागी न बनना पड़े। इस बिन्दु पर दो बातों पर ध्यान दिया जाना अतिआवश्यक होगा- पहली बात तो यह कि पुलिस की पड़ताल और मेडिकल जांच में किसी तरह की कोताही न बरती जाए और वहीं पीड़िता स्वयं को अथवा उसके परिजन उसे मेडिकल जांच के लिए जल्दी से जल्दी प्रस्तुत कर दें। बलाकात्कार के संदर्भ में मनोवैज्ञानिक डॉ. वाणी नायर का कहना है कि -‘‘पीड़िता के लिए यह एक सदमे का विषय होता है। यह सामान्य चोट लगने जैसी स्थिति नहीं होती है कि घर जा कर तुरन्त सबको बता सकें। पीड़िता सदमें के उबरने के बाद ही घटना का विस्तृत विवरण दे पाती है।’’
जहां तक पुलिस छानबीन का प्रश्न है तो भोपाल में हुए बलात्कार कांड में पीड़िता के स्वयं थाने पहुंचने पर भी तत्परता से रिपोर्ट न लिखा जाना एक ऐसा उदाहरण है जो पुलिस की कार्यवाही पर उंगली उठाती है। यद्यपि इस मामले में दोषी पुलिसकर्मियों को विभागीय दण्ड दिया जा चुका है लेकिन प्रश्न उठता है कि इस प्रकार की ढीली-ढाली व्यवस्था में सही अपराधी के विरुद्ध दमदार साक्ष्य कैसे जुटाए जा सकेंगे। इस भोपाल बलात्कार कांड में पुलिस ने एक गलत आदमी को बलात्कार के संदेह में पकड़ ही लिया था और बाद में उसे छोड़ना पड़ा।
बलात्कार एक ऐसा जघन्य किन्तु संवेदनशील अपराध है जो पीड़िता के जीवन को तो प्रताड़ित करता ही है, साथ ही पूरे परिवार को प्रभावित करता है। न केवल पीड़िता और सके परिवार के पक्ष को अपितु उस हर व्यक्ति को चोट पहुंचाता है जिसे इस अपराध के संदेह में पकड़ा गया हो। भले ही वह व्यक्ति के बाद निर्दोष निकल आए किन्तु संदेह का दाग उसके दामन पर उम्र भर के लिए लग जाता है। फिर जब सज़ा का स्वरूप फांसी का हो तो आवेश, भावुकता अथवा लापरवाही कां छोड़ कर पुलिस की कार्यवाही में र्प्याप्त सजगता और तत्परता की दरकार होगी।
पिछले कुछ समय से भावुकतापूर्ण निर्णयों का चलन दिखाई देने लगा है। यह सच है कि गैंगरेप जैसे जधन्य अपराध की पीड़िता के प्रति सहानुभूति होना स्वाभाविक है। ऐसी घटनाएं प्रत्येक व्यक्ति को भावुकता से भर देती हैं और वह अपराधी को कड़ी से कड़ी सजा दिलाना चाहता है। हरियाणा के स्कूल में एक बच्चे की हत्या के बाद वकीलों द्वारा भावुकता में आ कर अभियुक्त के पक्ष से मुकद्दमा नहीं लड़ने की घोषणा कर दी थी। जबकि सीबीआई की जांच से बाद इस बात के संकेत मिले कि दोषी माना जा रहा कंडक्टर वास्तव में दोषी नहीं था और उसने पुलिस की प्रताड़ना से घबरा कर अपराध स्वीकार कर लिया था जो कि उसने किया ही नहीं था। हाल ही में दूसरी बार भोपाल बलात्कार कांड में भी वकीलों ने अभियुक्तों की ओर से मुकद्दमा नहीं लड़ने की घोषणा कर दी थी। तमाम साक्ष्यों के साथ यह सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक होगा कि अभियुक्त वास्तविक अपराधी है या नहीं। इसके लिए उन सभी लोगों को भी भावुकता का त्याग करना होगा जो अपराध की गंभीरता एवं अमानवीयता को देख कर अभियुक्त का मुद्दमा न लड़ने की घोषणा कर बैठते हैं। अपराधी माने जा रहे व्यक्ति का अपराध जब तक सिद्ध न हो जाए उसे कानून के प्रतिनिधियों के माध्यम से अपना पक्ष सामने रखने का अधिकार होता है। यह अधिकार उसे इसीलिए दिया जाता है कि कहीं कोई निरपराध सजा का भागी न बन जाए।
वैसे, रेप एवं गैंगरेप के मामलों में जुवेनाईल धाराओं में भी अभी संशोधन की आवश्यकता है। यदि कोई नाबालिग बलात्कार जैसा बालिग अपराध करता है तो उसे बालिगों की श्रेणी में माना जाना चाहिए। दिल्ली के निर्भया कांड के बाद यह मांग तेजी से उठी थी। तब सन् 2015 में जुवेनाइल बिल राज्य सभा में भी पास कर के राष्ट्रपति की मंज़ूरी के लिए भेजा गया। इस बिल के में प्रावधान रखा गया कि अगर जुर्म ’जघन्य’ हो, यानी आईपीसी में उसकी सज़ा सात साल से अधिक हो तो, 16 से 18 साल की उम्र के नाबालिग को वयस्क माना जाएगा। इस कानून के जरिए नाबालिग़ को अदालत में पेश करने के एक महीने के अंदर ’जुवेनाइल जस्टीस बोर्ड’ ये जांच करेगा कि उसे ’बच्चा’ माना जाए या ’वयस्क’ और वयस्क माने जाने पर किशोर को मुकदमे के दौरान भी सामान्य जेल में रखा जाएगा। हालांकि अगर नाबालिग को वयस्क मान भी लिया जाए तो मुक़दमा ’बाल अदालत’ में चले और आईपीसी के तहत सज़ा हो उम्र क़ैद या मौत की सजा नहीं दी जा सकती। एनसीआरबी रिपोर्ट के अनुसार 2014 में किशोरों द्वारा किए गए अपराधों की संख्या में 132 फीसदी का इजाफा देखने के मिला है, जिसमें बलात्कार की घटनाओं में यह वृद्धि 60 फीसदी से अधिक है। इस रिपोर्ट के अनुसार दर्ज किए गए मामलों में 66 फीसदी से अधिक बच्चों की उम्र 16-18 साल के बीच है। नाबालिगों में इस तरह के अपराधों की बढ़ती दर को देखते हुए कानूनन कठोर कदम उठाया जाना जरूरी है।
यह बात तय है कि यदि हमें रेप, गैंगरेप, सोशल मीडिया पर यौनअपराध की वीडियो अपलोडिंग आदि अपराधों से मुक्ति चाहिए तो कठोर कदमों का स्वागत करना ही होगा।
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Wednesday, November 29, 2017

Thank You Google to make my Birthday very special by Doodle !!!

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